जब हनुमान जी ने महाबली भीम का घमण्ड तोड़ा। हनुमान-भीम प्रसंग।

पांडवों में भीम “महाबली” थे, जो पवनपुत्र के नाम से भी जाने जाते थे। हनुमान जी भी पवनदेव के पुत्र थे इसीलिए भीम और हनुमान दोनों भाई थे।

यह प्रसंग द्वापर युग की है जब कौरवों से हार के बाद पांडव बद्रिका आश्रम में वनवासी जीवन व्यतीत कर रहे थे।

एक दिन की बात है, वायु के प्रबल झोंके से उड़कर हिम सरोवर में उगने वाला बहुत सुन्दर, अनोखी सुगन्ध वाला ब्रह्म कमल (सहस्त्रदल कमल) का एक फूल उत्तर दिशा के ऊपर से उड़कर पांडवों के समीप गिर पड़ा।

द्रौपदी ने फूल उठाया और भीम को दिखाते हुए कौतुहलवश पूछा – ‘आर्यपुत्र ऐसा अद्भुत फूल मैंने अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा। क्या आप मेरे लिए इस जैसा और फूल ला सकते हैं? मैं इन फूलों से अपने बाल सजाऊँगी।’

भीम ने अपने बड़े भाई युधिष्ठिर की तरफ देखा और आँखों से संकेत पाकर द्रौपदी से बोला- ‘हाँ क्यों नहीं, मैं तुम्हारे लिए ऐसे फूल अवश्य लाऊँगा। चाहे वह मुझे किसी भी जगह क्यों न मिले।’

भीम को अपनी शक्ति पर बहुत अभिमान था। उसे यह विश्वास था की पूरे ब्रह्मांड में उसके उसके जैसा महाबली कोई नहीं है।

भीम नें अपनी गदा उठाई और फूल लाने उत्तर दिशा की ओर चल पड़े। उनकी हुंकार से वन के प्राणी भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे।

चलते-चलते भीम गंधमादन पर्वत की चोटी पर स्थित एक बगीचे में पहुँच जाते हैं।

यह सारी बात हनुमान जी देख रहे थे। वे उन दिनों उसी पर्वत की चोटी पर विश्राम कर रहे थे। हनुमान जी चिंतित हो उठे। उन्होने सोंचा- ‘भीम भी पवनदेव के वरदान से पैदा हुए हैं। इसीलिए वे मेरे छोटे भाई हैं।

अहंकारवश जिस वेग, गर्जना और हुंकार से वे वन को कँपाते हुए वे आगे बढ़ रहे हैं, इससे उनकी जान को खतरा है। उन्हे नहीं मालूम है की उनकी गर्जना से बर्फ की चोटियों से बर्फ टूटकर नीचे गिरेगी और उनके प्राण संकट में आ जाएंगे।’ दूसरी बात यह है की उन्हे ब्रह्म कमल के मिलने के सही स्थान की जानकारी भी नहीं है।

हनुमान जी ने एक बूढ़े वानर का वेश बनाया और भीम के रास्ते में आकार लेट गए और भीम का रास्ता रोक दिया।

थोड़ी हीं देर मे भीम वहाँ पहुँच गए। भीम ने कहा- ‘मेरे रास्ते से हटो वानर, क्या तुम्हें अपने प्राणों का मोह नहीं है ? तुम तो सारा रास्ता हीं रोककर लेट गए हो।’

हनुमान जी नें अपना सर घुमाया और भीम की ओर देखते हुए कहा- ‘मैं रोगी हूँ युवक, यहाँ कुछ देर पड़ा विश्राम कर रहा था। तुमने मुझे नींद से क्यों जागा दिया?’

भीम ने गुस्से में कहा- ‘विश्राम हीं करना है तो मार्ग से हटकर किसी सुरक्षित स्थान पर जाकर करो। बीच मार्ग में लेटकर विश्राम करना कहाँ की बुद्धिमानी है।’

हनुमान जी ने कहा- ‘मैंने तुम्हें बताया तो है की मैं बीमार हूँ। अपनी जगह से हिल सकने में भी असक्षम हूँ। पर तुम कौन हो युवक और इस सुनसान स्थान पर किसलिए विचरण कर रहे हो?’

भीम बोले- मैं कोई भी हूँ तुम्हें इससे क्या मतलब मुझे आगे बढ़ना है तुम मेरे रास्ते से हट जाओ।’

हनुमान जी ने कहा- ‘तुम मेरी पूंछ को एक ओर खिसका दो और रास्ता बनाकर निकाल जाओ।

भीम ने झुककर हाथ से पूंछ पकड़कर एक ओर रख देना चाहा। लेकिन पूंछ अपनी जगह से हिली तक नहीं। फिर उन्होने अपने दोनों हाथों से पूंछ उठानी आरम्भ कर दिया। लेकिन पूंछ तो जैसे जमीन से चिपक गई थी। भीम की पूरी शक्ति लगाने के बाद भी वह टस से मस न हो सकी।

थक हारकर भीम उठ खड़े हुए और विवश होकर बोले- ‘वानर राज आपकी पूंछ मुझसे नहीं उठती। मैं अपनी हार स्वीकार करता हूँ। लेकिन मुझे अपना सही परिचय दीजिये। आप साधारण वानर प्रतीत नहीं होते।’

‘मैं पवनसुत हनुमान हूँ’ हनुमान बोले। और अपना विशाल रूप भीम को दिखाया। हनुमान का नाम सुनते हीं भीम उनके चरणों में गिर गए।

हनुमान जी से भीम ने आशीर्वाद लिया। और पद्म सरोवर जाने का मार्ग पूछा। उन्होने जाने का मार्ग बता दिया और बोले- ‘कुछ आगे जाने पर तुम्हें सरोवर मिल जाएगा, जहां ये पुष्प होते हैं। यक्ष अगर पुष्प तोड़ने में बाधा डालें तो उन्हे मेरा नाम बता देना वे पुष्प ले जाने देंगे।’

भाई होने के नाते हनुमान जी ने भीम को यह वचन भी दिया की वो युद्ध में अर्जुन की रथ के ध्वज पर बैठ कर ऐसी भीषण गर्जना करूंगा की शत्रुओं में भगदड़ मच जाएगी और तुम उन्हे आसानी से धूल चटा दोगे।

यह कहकर हनुमान जी चले गए और भीम सरोवर की ओर बढ़ चले। सरोवर पर पहुँच कर उन्होने यक्षों से अनुमति लेकर कुछ फूल तोड़े फिर उसे लेकर वापस लौट गए। द्रौपदी ने प्रसन्नता पूर्वक उसे अपने बालों में लगाना आरम्भ कर दिया।

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